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Ab To Path Yahi Hai - Kavi Dushyant Kumar


ज़िन्दगी ने कर लिया स्वीकार,
अब तो पथ यही है l

अब उभरते ज्वार का आवेग मंध्दिम हो चला है,
एक हल्का सा धुंधलका था कही, कम हो चला है,
यह शिला पिघले न पिघले, रास्ता नम हो चला है,
क्यों करूं आकाश की मनुहार,
अब तो पथ यही है l

क्या भरोसा, कांच का घट है, किसी दिन फूट जाए,
एक मामूली कहानी है, अधूरी छूट जाए,
एक समझौता हुआ था रोशनी से, टूट जाए,
आज हर नक्षत्र है अनुदार,
अब तो पथ यही है l

यह लड़ाई, जो कि अपने आप से मैंने लड़ी है,
यह घुटन, यह यातना, केवल किताबों में पढ़ी है, 
यह पहाड़ी पाँव क्या चढ़ते, इरादों से चढ़ी है,
कल दरीचे ही बनेंगे द्वार, 
अब तो पथ यही है l 


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